आजकल कहां रहते हो तुम ?
देखते ही देखते, कही के भी नही रह जाते हो तुम.
एक जमाने में कहते थे की मै तुम्हारी पलक हुं..
रोज खतों में मुठ्ठीभर सांसे भेजते थे तुम.
और आज अखबार की पन्नोंसे खोई हुई आंखोंसे
देखी-अनदेखी युंही कर जाते हो तुम.
एक जमाने में हाथोंकी मेहंदी पागल बना देती थी तुम्हे..
चुडियोंकी रातभर कि खनखनाहटसे दिनभर शर्माती थी मै..
और आज सुबह की चाय,नाश्ता लिये पिठ फिरे,बिना बोले ऐसे चले जाते हो तुम जैसे कि पैसे मिलने पर कुली.
सुबह हुये..शाम ढले..कामोंकी व्यस्तता इतना बिखर देती है तुम्हे,
की कितना भी खोजू तुम्हे
खाली ही रहती है ओस मेरी.
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